अनुगूँज 23: ऑस्कर, हिन्दी और बॉलीवुड
इस के लेख़क हैं आशीष श्रीवास्तव   
गुरुवार , 22 मार्च 2007

नोट : इस लेख मेरे अपने विचारों को प्रदर्शित करता है। आप इस इससे सहमत नही है तो अपनी प्रतिक्रिया संयत भाषा मे दर्ज करांये। आपत्तिजनक या अभद्र भाषा वाली प्रतिक्रियां हटा दी जायेंगी

 भूमिका

भारतीय फिल्म उद्योग विश्व फिल्म उद्योग मे हॉलीवुड के बाद दूसरे नम्बर पर आता है लेकिन एक विडंबना यह है कि आज तक कोई भी भारतीय(फिल्म या व्यक्ति) सफल नही हो पाया है। सत्यजीत रे को ऑस्कर मिला था लेकिन वह उनके फिल्म उद्योग मे योगदान के लिये ना कि किसी विशेष फिल्म के लिये।

ऐसा क्यो होता है क्यों किसी फिल्म या व्यक्ति को ऑस्कर या एकेडमी पुरस्कार नही मील पाते ? आमतौर पर एक तर्क यह दिया जाता है कि ऑस्कर पुरस्कार मे मुख्य चयनकर्ता पश्चिमी देशों से होते है और उनके श्रेष्ठता के मानदंड पश्चिमी मानसिकता पर आधारित होते है। कुछ हद तक यह आरोप सही भी है, क्योंकि यह तर्क अन्य पुरस्कारों पर भी लागू होता है। नोबेल शांति पुरस्कार यासिर अराफ़ात जैसे आतंकवादी को दिया जा चुका है लेकिन महात्मा गांधी जैसे व्यक्तित्व को इसके उपयुक्त नही समझा गया। साहित्य मे रवींद्रनाथ टैगोर के अलावा कोई भी इसके लायक नही समझा गया। क्या हमारे प्रेमचंद,शरतचन्द्र,सुब्रहमन्यम भारती, निराला, वात्सायन, यशपाल,रेणु, कमलेश्वर  किसी से कम है ?

लेकिन इस तर्क का दूसरा पहलू यह भी है कि आप श्रेष्ठ हो सकते है। लेकिन क्या आपको अपनी श्रेष्ठता का प्रचार करना आता है ? लगान, जब ऑस्कर के अंतिम चरण तक पहुंची थी, उसमे फिल्म की श्रेष्ठता के अलावा ,उसके प्रचार का  भी योगदान था। भारतीय मानसिकता बाजारवाद की विरोधी रही है, किसी भी चीज का प्रचार प्रसार,उन्हे अपने सांस्कृतिक मुल्यो पर आघात लगता है। जबकि हॉलीवुड की फ़िल्मे या अन्य देशों की फ़िल्मे अपने प्रचार प्रसार मे पैसों को पानी की तरह बहाते है।

अब कुछ दूसरे मुद्दों पर भी ध्यान देते है, एकेडमी पुरस्कार या ऑस्कर, नोबेल पुरस्कार की अंतराष्ट्रीय पुरस्कार नही है। यह एक अमरीकी पुरस्कार है, ऐसा कहीं लिखा नही गया है लेकिन इसके नियमों के अनुसार इस पुरस्कार के लिये नामित फिल्म को उस वर्ष मे लास एंजील्स मे प्रदर्शित होना चाहिये। ऑस्कर पुरस्कार के लिये ऐसे तो किसी विशेष भाषा मे फिल्म होना चाहिये ऐसा भी नियम नही है लेकिन यह भी एक सच है कि ऑस्कर के इतिहास मे सर्वश्रेष्ठ फिल्म श्रेणी मे २००६ तक सिर्फ आठ विदेशी फ़िल्मे नामित हुयी है। भारतीय फ़िल्मे इस पुरस्कार के लिये सिर्फ विदेशी भाषा पुरस्कार श्रेणी मे ही भाग ले सकती है।  इस वजह से यह पुरस्कार विदेशी भाषा श्रेणी को छोड़कर अन्य श्रेणीयो मे अंग्रेजी फिल्मों के लिये ऑस्कर पुरस्कार बन कर रह गया है।

भारतीय फ़िल्मो की गुणवत्ता

मैं अब सबसे विवादास्पद मुद्दों को उठाने जा रहा हूँ, इन मुद्दों पर मुझे आलोचना की पूरी उम्मीद है। हम भारतीय फ़िल्मो को दो श्रेणीयो मे रख सकते है, व्यावसायिक और कला फ़िल्मे।

व्यावसायिक फ़िल्मो की गुणवत्ता

अभिनय

क्या आपको लगता है कि भारतीय व्यावसायिक  फ़िल्मो मे अभिनय पुरस्कार पाने लायक होता है ? भारतीय इतिहास की सबसे ज्यादा सफल फिल्म शोले मे किसी भी अभिनेता का अभिनय ऐसा है कि उसे ऑस्कर के लिये नामित किया जा सके ? मैने यह फिल्म अभी तक दसियों बार देखी है, यह एक बेहतरीन मनोरंजक फिल्म है, लेकिन है तो मसाला फिल्म ! क्या कोई भी विदेशी आलोचक इसकी प्रशंसा कर पायेगा ! मुगले आजम मे क्या आपको दिलीपकुमार का या पृथ्वीराज कपूर का अभिनय स्वाभाविक अभिनय लगता है ? क्या इसमे आपको नाटकीयता साफ साफ नही झलकती ? मुझे इससे ज्यादा स्वाभाविक अभिनय तो चलती का नाम गाड़ी या पड़ोसन मे किशोर कुमार का लगता है!  इन फ़िल्मो विशुद्ध हास्य फिल्म होने के बावजूद कहीं भी आपको अभिनय मे नाटकीयता नही दिखती। अभिनय के बेताज बादशाह कहलाने वाले अमिताभ ने ऐसी कौनसी फिल्म की है जिसे ऑस्कर मे भेजा जा सके ? हां आनंद एक अपवाद हो सकती है!  शाहरूख़ ,आमिर खान जैसे अभिनेताओं मे मुझे ऐसी कोई अभिनय क्षमता नही दिखाई देती जो उन्हे शीन कानरी ,टाम हैंक्स, जैक्स निकल्शन या डेन्जल वाशींगटन बना सके!

तकनीक

भारतीय फ़िल्मो का बजट इतना ज्यादा कभी नही होता कि वे अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग कर सके। इसके पीछे इन फ़िल्मो का बाजार भी एक कारण होता है। भारतीय फिल्म निर्माता शायद ही कभी अपनी फ़िल्मो मे जूरासीक पार्क या टर्मिनेटर जैसी फ़िल्मो के जैसे तकनीक का प्रयोग कर सके। हां क्रिश, धूम मे कोशिश ज़रूर हुयी है लेकिन ऑस्कर के लायक ?

निर्देशन

क्या कोई भारतीय निर्देशक जेम्स कैमरान या स्टीवन स्पीलबर्ग जैसा निर्देशन कर सकता है, क्या उनके जैसी कल्पना कर सकता है ? सत्यजीत रे एक अपवाद ज़रूर है लेकिन कोई और निर्देशक मुझे इस दर्जे का नजर नही आता कि वह निर्देशन के बलबूते पर ऑस्कर दिला सके। जी हां कपूर, ऋषीकेश मुखर्जी, सुभाष घई या राम गोपाल वर्मा बेहतरीन निर्देशक है लेकिन ऑस्कर के लायक है इसमे मुझे शक है।

संगीत

भारतीय फ़िल्मो का गीत संगीत पक्ष अच्छा होता है इसमे कोई शक नही है। लेकिन यही गीत संगीत पक्ष भारतीय फ़िल्मो के ऑस्कर जितने की राह मे परेशानी भी खड़ी करता है। ये फिल्म की गति को प्रभावित करते है। अब आप ही सोचीये फिल्म अपने चरमोत्कर्ष पर है, नायक जिदंगी के लिये संघर्ष कर रहा है। इतने मे नायिका या नायक की माँं मंदिर मे जाकर एक गाना शुरू कर देती है। अब हिन्दी फ़िल्मो ऐसे बेहुदा जगहों पर गीत डाले जायेंगे तो इसका विदेशी समीक्षकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। एक अच्छी ख़ासी गंभीर फिल्म हास्य फिल्म बन कर रह जाती है।
अब भारतीय व्यावसायिक सिनेमा अभिनय, तकनीक, निर्देशन और संगीत किसी भी विभाग मे विश्व स्तरीय नही है तो ऑस्कर की उम्मीद कैसे करें ?

कला फ़िल्मे

कला फ़िल्मो के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इन्हे देखने के लिये भारत मे ही दर्शक नही मिलते है। जब दर्शक नही तो पैसे नही, पैसा नही तो ऑस्कर के लिये फिल्म नामित कैसे हो। नामित हो भी गयी तो प्रसार प्रचार के लिये पैसा कंहा से आयेगा ? भारतीय कला फ़िल्मे अभिनय, निर्देशन और संगीत के क्षेत्र मे किसी से कम नही है। ओम पूरी, नसीरुद्दीन शाह, स्मीता पाटिल, अमरीश पूरी , पंकज कपूर, रघुवीर यादव और शबाना आज़मी जैसे अभिनेता किसी परिचय के मोहताज नही है। लेकिन इन्हे ऑस्कर के प्लेटफॉर्म पर अपनी क्षमता दिखाने का मौका ही नही मील पाता।

पिछले वर्ष ऑस्कर के लिये नामित फिल्म 'श्वास' ने अच्छी फिल्म होने के बाद भी प्रचार प्रसार के अभाव मे दम तोड़ दिया था।'सलाम बॉम्बे' के साथ भी यही हुआ था। इस वर्ष की त्रासदी यह रही कि एक बेहतरीन फिल्म 'वाटर' को अपने ही देश से नामित नही किया गया, उसे एक दूसरे देश 'कनाडा' से नामित होना पड़ा। अवास्तविकता के धरातल पर आधारित ' रंगे दे बसंती' ऑस्कर के लिये जाती है और पिट कर आती है। 'वाटर' और 'लगे रहो मुन्नाभाई' जैसी अच्छी फ़िल्मे नामित नही हो पाती।

निष्कर्ष

यदि भारतीय फ़िल्मो को ऑस्कर जितने की उम्मीद रखना है तो इस उद्योग मे आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। मौजूदा परिस्थिति मे ऑस्कर जितना एक दिवास्वप्न से ज्यादा और कुछ नही है।

टिप्पणीयां (41) | पसंदिदा लेख की सूची मे जोडे़ (370) | इस लेख का अपनी साईट पर उल्लेख करें। | Views: 3294

आखरी बार संपादन किया गया ( गुरुवार , 22 मार्च 2007 )
 
एक नया रिश्ते की शुरूवात
इस के लेख़क हैं आशीष श्रीवास्तव   
गुरुवार , 15 मार्च 2007

रिश्तो की बुनियाद क्या होनी चाहिये ? आपसी विश्वास और समझबूझ ही ना ! लेकिन इन लोगो को क्या कहें जो रिश्तो की शुरूवात ही झूठ की बूनियाद पर करना चाहते है! ऐसा भी नही है कि ये लोग झूठ बोलना चाहते है। हमारा सामाजिक परिवेश ही कुछ ऐसा हो गया है कि ना चाहते हुये भी लोगो को झूठ बोलना या झूठ गढ़ना पड़ता है।

अब आप सोचेंगे कि आज इस खालीपीली को क्या हो गया जो ऐसी समझदारी भरे उपदेश देने लगा ! अब क्या करें, हमारी भी मजबूरी है कि हम जिस अवस्था मे प्रवेश करने जा रहे है उस अवस्था मे समझदार का तमगा लगाना जरूरी हो जाता है। ज्यादा बड़ी भूमीका ना बनाते हुये हम मुद्दे पर आते है।

कुछ समय पहले की बात है, यही कोई तीन चार साल पहले। उस समय मै विप्रो मे नया नया आया था साथ ही और मेरी दो बहनो मे से बड़ी का रिश्ता तय हो गया था। उस समय मेरी अपनी शादी की कोई योजना नही थी, लेकिन रिश्ते आने शुरू हो गये थे। एक दिन एक सज्जन अपनी कन्या का रिश्ता लेकर मेरे घर आये। मैने उन्हे कम से कम दो तीन वर्ष अपनी शादी ना करने की योजना के बारे मे बताया। मना करने के बावजूद भी वे कन्या की फोटो और जन्मकुंडली देकर चले गये। सौजन्यता से हमने फोटो जन्मकुंडली रख ली। शाम को ऐसे ही हम लोग बाते कर रहे थे। मेरे भाई ने मस्ती मे उस कन्या की कुंडली मेरी कुंडली से मिलाने के लिये कम्युटर चालु कर दिया। उसने मेरी जन्मतिथी और कन्या की जन्मतिथी कम्प्युटर मे डाली। परिणाम देखकर वह चकरा गया। कन्या की कुंडली, कम्युटर की कुंडली से एकदम अलग थी। मैने उसे जन्मतिथी फिर से जांचने ले लिये कहा, उसने फिर मे पूरी जानकारी फीर से डाली परिणाम वही ढाक के तीन पात। मैने अपने भाई से कहा कि जन्मवर्ष बदल कर देखे। उससे कन्या की उम्र एक वर्ष बढा कर देखा। इस बार कम्प्युटर द्वारा बनायी गयी कुंडली और कन्या के पिता द्वारा दी गयी कुंडली मील गयी थी। बाद मे पता चला कि कन्या मुझसे एक वर्ष बडी़ थी इसलिये उसके पिता ने जो बायोडाटा हम लोगो को दिया था उसमे उसकी जन्मतिथी बदल दी थी। अब क्या कहें ? मान लेते है कि मै कुंडली नही मिलाता और ये भी मान लेते है कि ये रिश्ता हो जाता । किसी दिन ये झूठ पकड़ मे आने पर क्या होता ?

इस घटना से चार वर्ष बाद मेरी दूसरी बहन की शादी भी हो गयी। मेरे बहन की शादी तुरंत बाद ही मेरी शादी के लिये कुछ प्रस्ताव आ गये थे। मेरा छोटा भाई इन सभी प्रस्तावो को देख रहा था। मेरी और मेरे भाई दोनो का एक ही विचार था कि लड़की देखने के बेहुदा कार्यक्रम से बचा जाये। लेकिन हम लोग इससे बच नही सकते थे तो यह निश्चित किया गया कि सभी बायोडाटाओ से सबसे अच्छे २-३ बायोडाटाओ को अलग कर लो। इन २-३ बायोडाटाओ मे से एक रिश्ते को ही अंतिम रूप दे दो। अब इन सभी बायोडाटाओ मे से २-३ को चुनना एक मुश्किल काम था। पहला फिल्टर लगाया गया कि जो भी रिश्ते हम लोगो के रिश्तेदारो ने भीजवाये है उन्हे अलग कर दो। यहां हम लोगो को मालूम था कि ये रिश्ते मेरे लिये यानी 'आशीष' के लिये नही, विप्रो के प्रोजेक्ट मैनेजर के लिये आये है। दूसरा फिल्टर था कि रिश्ते लेकर आये लोगो का व्यव्हार कैसा था। जहां भी हमे दिखावे या शानो शौकत वाली बात दिखी उन्हे अलग कर दिया गया। एक महाशय जब रिश्ता लेकर आये थे तब उन्होने द्वार पर ही पहला वाक्य कहा था कि मै इस शादी मे १५-२० लाख तक खर्च कर सकता हूं।

वैसे सबसे बड़ा फिल्टर मेरी कुंडली थी। मेरी कुंडली मंगली है, जिससे होता यह था कि कुछ प्रस्ताव तो कन्यापक्ष द्वारा वापिस ले लिये जाते थे।

इन सबके बाद हम लोगो के पास तीन प्रस्ताव बचे थे। पहला रिश्ता राजनांदगांव(नीरज दिवान का गांव ), दूसरा भिलाई का और तीसरा जबलपूर से था।

फरवरी के मध्य मे मुझे अपने गृह नगर गोंदिया अपने अंतिम कुंवारे दोस्त के विवाह पर जाना था। हमने भी सोचा कि चलो इस दौरान इन तीन प्रस्तावो पर भी गौर फरमाया जाये। तीनो कन्यापक्षो को सूचना दे दी कि हम इस दिन इस समय पहुंच रहे है। १६ फरवरी की सुबह मै और मेरा छोटा भाई दोनो सुबह सुबह सज धज कर चल दिये। पहला पढा़व राजनांदगांव(निरज दिवान का राजनांदगांव) का था। इस पढा़व पर अंत मे आते है।

राजनांदगांव से हम चले इस्पात नगरी भिलाई की ओर। बस स्टैंड पर कन्या का भाई हमे लेने के लिये आया हुआ था। घर पहुंचने के बाद सबसे पहला कार्य उन्होने किया अपना घर दिखाने का। हम दोनो भाई एक दूसरे की ओर देख कर मुस्करा रहे थे। बाद मे वे कहने लगे कि ये उनके घर की पहली शादी है इसलिये शादी धूमधाम और तरिके से होगी। हम शब्दो का अर्थ समझ रहे थे। इसके बाद अंत मे कन्या आयी। कन्या को देखने के बाद हम दोनो भाई चकरा गये। कन्या को पहली नजर देखने के बाद हम लोग समझ गये थे कि जो तस्वीरे हमे दी गयी थी, उसमे साथ धूमधाम और तरिके से छेड़छाड़ की गयी थी। वह एक डीजीटल तस्वीर थी जिसमे फोटोशाप जैसे किसी टूल से बदलाव किये गये थे। मुझे सबसे ज्यादा चिढ़ जिस चिज से होती है वह है झूठ से..। मन कसैला हो गया था। हम लोग वापिस आ गये।

दूसरे दिन हम लोगो को जबलपूर जाना था। मेरी छोटी बहन और दामाद भी जबलपूर आ रहे थे, इसलिये हम लोगो ने मम्मी को भी साथ ले लिया था। जबलपूर पहुंचकर हम मेरी छोटी बहन के साथ उसके मामा ससूर के घर पहुंचे। वहां से तैयार हो कर कन्या पक्ष के घर पहुंचे। हम लोगो को बताया गया था कि कन्या भी मेरे क्षेत्र यानी आई टी मे काम करती है। वह भी मांगलिक है। उंचाई भी अच्छी है। कन्या के घर अच्छे से आवभगत हुयी। यहां पर भी लोग शुरू हो गये कि उनके घर मे पिछली शादी कैसे हुयी थी, कितना खर्च हुआ था वगैरह वगैरह...। मै और मेरा भाई अरूचि से सुनते रहे।

कन्या चाय की ट्रे लेकर आयी। फिर वही बात सामने आयी। तस्वीर के साथ छेड़छाड़ वाली। हमने सोचा चलो कोई बात नही। कन्या से जब मै बात कर रहा था तब पता चला कि वह मेरे क्षेत्र मे नही, विपणन के क्षेत्र मे है। बाद मे यह भी पता चला कि उसके बायोडाटा मे उसकी उम्र भी गलत है, ये कन्या मुझसे ७ वर्ष छोटी थी। बातो बातो मे उस कन्या ने यह भी कहा कि वह अपने करीयर के लिये गंभीर है।

हम लोग वापिस चल दिये गोंदिया अपने गृहनगर की ओर। पूरे रास्ते हम लोग इसी बात पर चर्चा करते रहे कि लोग पता नही शादी विवाह जैसी महत्वपूर्ण मौको पर झूठ का सहारा लेते है। तस्वीरो के साथ डीजीटली छेड़छाड़ करते है। गलत जानकारी दी जाती है। जबकि ये सारी बाते आमने सामने होने पर खुल कर आ जाती है।

अब हम आते है सबसे पहले पढाव राजनांदगांव की ओर। कन्या की जो तस्वीर हम लोगो के पास थी वह एकदम साधारण थी। ध्यान दे हमने यह कहा है कि तस्वीर साधारण थी नाकि कन्या। कन्या के बायोडाटा से हमे यह भी मालूम था कि यह एक मध्यम वर्गीय परिवार है, इसलिये दिखावे और शानोशौकत की उम्मीदे नही थी। लेकिन चक्कर यह था कि मै कन्या पक्ष का पता और फोन नम्बर अपने कार्यालय के कम्युटर चेन्नई मे भूल आया था। अब क्या किया जाये। कानपूर अनुप शुक्लाजी(अरे अपने फुरसतियाजी ) को SOS भेजा गया। उनकी मदद से कन्या के मामाश्री का नम्बर मीला। मामाश्री को हमने अपनी ट्रेन का नाम और समय बताया। उन्होने हमे बताया कि रेल्वे स्टेशन पर कन्या का भाई हमे लेने आ जायेगा।

राजनांदगांव पहुंचे, कन्या का भाई रेल्वे स्टेशन पर आया था। उसके साथ उसके घर पहुंचे। उम्मीदो के अनुरूप एक मध्यम वर्गिय घर, कहीं कोई दिखावा नही। साधारण साज सज्जा।कुछ देर बैठने के बाद नाश्ता आया। चाय की ट्रे के साथ कन्या आयी। पता चला कि कन्या के मामाश्री ने जो तस्वीर हमे भेजी थी वो चार से पांच साल पूरानी थी। मुझे और कन्या को अकेला छोड़ दिया गया। मै चूपचाप कभी नही रहता लेकिन यहां पर बोलती बंद। समझ नही आ रहा था कि बात कहां से शुरू की जाये। खैर बातो का सीलसीला जो शुरू हुआ वह रूकने का नाम नही ले रहा था। कुल मीला कर हम दोनो भाईयो को कन्या पसंद थी।

सामने टेबील पर नाश्ता रखा था जो कि हम दोनो भाईयो को पसंद नही था। हमारी विशेष फरमाईश पर कन्या द्वारा आलूपोहा बनाया गया। आलूपोहा कैसा था हम ये अभी नही बतायेंगे।

अब चेन्नई वापिस आने के बाद हमने कन्या के मामाश्री को अपनी रजामंदी की चिठ्ठी भेजी , जिसका उत्तर उन्होने रसगुल्ले खाते हुये हमे दिया। होली के अगले दिन ५ मार्च को कन्या पक्ष वाले हमारे घर गोंदिया आये थे। उन्होने रिश्ते पर अपनी मुहर लगा दी है। और हमे अब विश्व कंवारा मंच के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे रहे है। अब कन्या राजनांदगांव से है तो सोचते है कि राजनांदगांव के नीरज दिवान को अपना उत्तराधिकारी घोषीत कर दें।

अब इस चिठ्ठे का सबसे बड़ा सस्पेंस यानी कि कन्या के मामाश्री अर्थात हमारे होने वाले मामा ससूर जी कौन हैं.........

आप अनुमान लगायें, हम उत्तर अगले चिठ्ठे मे देंगे ! हमने पर्याप्त हिंट दे दी है.........

टिप्पणीयां (15) | पसंदिदा लेख की सूची मे जोडे़ (156) | इस लेख का अपनी साईट पर उल्लेख करें। | Views: 1961

 
स्वामीजी के पांच प्रश्नो का हल
इस के लेख़क हैं आशीष श्रीवास्तव   
बुधवार , 28 फ़रवरी 2007
अभी अभी हम प्रत्यक्षाजी के प्रश्नो को हल कर कर बैठे थे कि स्वामी जी की आकाशवाणी हुयी
 
"बच्चा यह वक्त शांत रहने का नही है, तुम्हारे लिये अभी पांच प्रश्न और बकाया है !"
 
प्रस्तुत है स्वामी जी के प्रश्नो का हल  
 
प्रश्न १. आपकी दो प्रिय पुस्तकें और दो प्रिय चलचित्र कौन सी हैं?
मेरी प्रिय पुस्तके, वह भी दो। मेरे लिये यह काफी कठीन प्रश्न है। पुस्तके पढ़ना आज मेरे लिये एक आदत नही , एक नशा है। मै बिना पुस्तको के नही रह सकता, मेरे पास हमेशा कम से कम एक नयी पुस्तक रहती है।
मै दो सबसे ज्यादा पसंदिदा पुस्तको नाम तो नही दूंगा, अपनी अनेको बार पढी कुछ पुस्तको के नाम जरूर दूंगा
१. Only The Paranoid Survives , Andrew S Grove
वर्तमान मे इस पुस्तक ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे मै हर किसी को पढ़ने की सलाह दूंगा। यह पुस्तक हर व्यक्ति को सचेत करती है कि आप कि जिन्दगी मे कभी भी कुछ भी अप्रत्याशित घटीत हो सकता है जिसके लिये आपको तैयार रहना चाहिये। मै इ-स्वामीजी का आभारी हूं जिन्होने मुझे यह पुस्तक पढने की सलाह दी थी।

२. Made in Japan - Akio Morita
क्या आप जानते है कि अच्छी गुणवत्ता का प्रतिक 'मेड इन जापान' किसी समय सोनी अपने उत्पादो मे छोटे महीन अक्षरो मे लिखा करती थी। एक समय 'मेड इन जापान' का मतलब एक खराब गुणवत्ता वाला उत्पाद हुआ करता था। सोनी के संस्थापको मे से एक अकी मारीतो द्वारा सोनी के जन्म और विकास की महागाथा।

३.मानसरोवर (सभी भाग)- प्रेमचंद
मुझे इस पुस्तक के बारे मे कुछ भी कहने की जरूरत नही है।

४. मृत्युंजय - शीवाजी सावंत
अभिशप्त योद्धा कर्ण की महागाथा।
 
५.Malgudi Days- आर के नारायणन
ये पुस्तक मेरा अपना बचपन है। स्वामी तो मेरा ही दूसरा नाम है।

६.कितने पाकिस्तान -कमलेश्वर

नफरत और घृणा के विश्व इतिहास पर एक और नजरिया ! क्या आप जानते है बाबर या उसकी सेना कभी अयोध्या नही पहुंची ! बाबरी मस्जीद किसने बनायी ? भारत मे नफरत की फसल किसने बोयी ? भारत विभाजन का जिम्मेदार कौन ? जिन्ना, महात्मा गांधी, नेहरू या माउंटबेटन ? जरूर पढे !
 
इसके अलावा भी ना जाने कितनी पुस्तके है, जो मुझे पसंद है....... यशपाल, जैनेन्द्रकुमार, रांगेय राघव, रेणु, जयशंकर प्रसाद, परसाई, शरद जोशी, रविन्द्रकांत त्यागी मेरे पसंदिदा लेखक है।

चलचित्रो मे जो मुझे पसंद है(भाई २ चलचित्र बहुत कम है)
  • १. जाने भी दो यारो
  • २.Beyond Border
  • ३.आनंद
  • ४. शोले
  • ५.छोटी सी बात (इसका नायक तो शायद मै ही हूं)

प्रश्न २. इनमें से आप क्या अधिक पसंद करते हैं, पहले और दूसरे नंबर पर चुनें - चिट्ठा लिखना, चिट्ठा पढना, या टिप्पणी लिखना, या टिप्पणी पढना (कोई विवरण, तर्क, कारण  हो तो बेहतर).

१.चिट्ठा पढना - पढना मेरा शौक नही , नशा है!
२.टिप्पणी पढना - किसी भी लेख पर दूसरो की प्रतिक्रिया जानना भी जरूरी है। यह आपकी सोच के दायरे को विस्तृत करता है।
३.टिप्पणी लिखना - एक भारतिय होने की पहचान। हर घटना, लेख पर अपनी प्रतिक्रिया देना हर भारतिय अपना जन्मसिध्द अधिकार समझता है चाहे वह उससे संबधित हो या नही Laughing
४.चिठ्ठा लिखना- अब ब्लाग बना लिया है तो लिखना तो पढेगा ही ना, और बुद्धीजिवी होने का एक भ्रम पालना भी जरूरी होता है Laughing
 
प्रश्न ३. आपकी अपने चिट्ठे और अन्य चिट्ठाकारों की लिखी हुई पसंदीदा पोस्ट कौन-कौन सी हैं?
अपने लिखे हुये चिठ्ठो मे मुझे "क्या आम इंसान जानवरों से भी गया गुजरा हो गया है ?"
आदर्श प्रेमीका के गुण ज्यादा पसंद है।

बाकी चिठ्ठाकारो मे २ चुनना मुश्किल है।
गंभीर लेखो मे फुरसतिया जी के , सुनिल दिपक जी के, इ-स्वामी जी, हिन्दी ब्लागर जी के, उन्मुक्त जी के सभी लेख पसंद है। व्यंग्य लेखो मे अतुल श्रीवास्तव , अनुराग श्रीवास्तव , समीर लाल के लेख पसंद है। शुयेब की खुदा सीरीज के तो क्या कहने !

प्रश्न ४. आप किस तरह के चिट्ठे पढना पसंद करते हैं?
सभी समाचार और साम्यवादी विचारधारा के छोड़कर। ये मुझे हजम नही होते।

प्रश्न ५. चिट्ठाकारी के चलते आपके व्यापार, व्यवसाय में कोई बदलाव, व्यवधान, व्यतिक्रम अथवा उन्नती हुई है.

चिठ्ठाकारी के चलते व्यापार, व्यवसाय में कोई बदलाव, व्यवधान, व्यतिक्रम अथवा उन्नती तो नही हुयी है। लेकिन निजी जिवन मे बदलाव जरूर आये हैं। अब एक अच्छा खासा समय चिठ्ठाकारी को दे देता हूं। मै एक तकनिकी व्यक्ति हूं, इस वजह से हिन्दी मे संगणक प्रयोग को बढावा देने के लिये अनुप्रयोगो के निर्माण के लिये काम कर सकता हूं। कुछ काम भी प्रारंभ किया लेकिन मै इसके लिये लगातार समय नही दे पा रहा हूं। उम्मीद है कि निकट भविष्य मे इन्हे पूरा कर सकूं।

टिप्पणीयां (72) | पसंदिदा लेख की सूची मे जोडे़ (167) | इस लेख का अपनी साईट पर उल्लेख करें। | Views: 3222

 

नारद से

कौन है ऑनलाइन

© 2009 हिन्दीग्राम
Joomla! is Free Software released under the GNU/GPL License.
जूमला! एक निःशुल्क सॉफ्टवेयर है जो GNU\GPL लाइसेंस के अंतरगत उपलब्ध है